Wednesday, October 14, 2009

एसी सी ही कुछ हो गई है ज़िन्दगी,
चंद साँसों में उलझी ज़िन्दगी.
शक होता है चाह जीने की इसे फ़ीकी पड़ गई है
या सचमुच वक़्त मंहगा हो चला है.
काश के ज़िन्दगी में भी एक रिमोट नाम की चीज़ होती.
इस रेस में कहीं पूर्णविराम नहीं तो अल्पविराम तो लगता...
ज़िन्दगी दम भर सांस लेने की मोहताज तो न रहती.
दो बूँद ही तो लगते हैं गुलिस्ताँ को आबाद करने केलिए,
एक तुम लेआओ,
एक मैं बरसा देती हूँ...
बाकी काम कुच्छ कुदरत की फ़ितरत पे छ्चोड़ते हैं!

कल

एक भुला सिसकता साया,
किसी अजनबी शेहेर की भीड़ में
जब बीता रिश्ता एक रूह-बरूह करता है,
हाँफते-हाँफते अपना अक्स
पहले बनता, फिर बताता है.
तब चीख चीख के यह खामोश मन कहता है,
हाँ-हाँ मैं इसे जनता हूँ.....
ये, मेरा गुज़रा हुआ कल है.

एक अरसा हो गया...

एक अरसा हो गया...
की खुद से बातें करीं हो मैंने,
की परछाई अपनी धुदी हो मैंने,
या यूँहीं अकेले बैठ मुस्कुराई हूँ.

एक अरसा हो गया...
की खामोशी को सुना हो मैंने,
की अँधेरे में कुछ देखा हो मैंने,
या संदूक कोई पुराना खोला हो.

एक अरसा हो गया...
की पुराने ख़त फिर पढ़े हों मैंने,
की हंसते हंसते आसूं पोंचे हो मैंने,
या गले लिफाफों में रिश्ते ढूंढे हों.

एक अरसा हो गया...
कुछ कत्चे टाँके मारे हों मैंने,
की तस्वीरों का पिटारा फिर खोला हो मैंने,
या गठरी की उस गांठ से लड़ी हूँ.

एक अरसा हो गया...
की यारों से यारी निभाई हो मैंने,
की वो सूखे फूल फिर छिपाए हों मैंने,
या सिर्फ किसी को थमा हो.

एक अरसा हो गया...
की खुद से बातें करीं हो मैंने,
की परछाई अपनी फिर धुंदी हो मैंने,
या अकेली बैठ मुस्कुराई हूँ...
एक अरसा हो गया.
कल रात एक हवा के झोंके ने
मरी खिड़की पे दस्तक दी थी,
फिर इजाज़त भी मांगी कुछ देर ठेहेरने की.
अंजन सी उस शक्ल पर मैंने पर्दा कर दिया...
और जाते क़दमों की आहट भी सुनी.
पीछे बची खामोशी और घुर्राते चाँद से पूछा,
तो तुनक के बोले...
वो जो चली गई, तेरी रूह थी.

safed chadar

एक सफ़ेद चादर...
जो चार पायों के बीच
कांहीं सिकुडी पड़ी है.
गोर से देखो तो सिलवाते भी साफ़ मालूम पड़ती हैं.
इतने शोर के बीच यंहन एक अजीब सा संता है.
दो जिस्म, दो जाने, दो रूहें...
आज भी यंहन रोज़ एक होती हैं.
मेरी आखों में कुछ चुभा,
जब मोहोबत को इस तरह सरेआम नुमाइश पे पाया.
मन में कांहीं एक चीख उठी,
जब उस सफ़ेद चादर में दफानी उन तमाम आहों को महसूस किया.
चाँद की जवानी भी इसकी हर सिलवट पर लोटती है.
उन सर्द हवनों में यंहन दबे शोलों की आग कुछ और बड़ती है.
मेह्फिलिएँ लोग आज भी यंहन लगते हैं...
इस मंज़र को यह लोग...ताज महल कहा करते हैं.