Tuesday, April 6, 2010

नीम के पत्ते

झूमते-गाते, गुलटियाँ मरते...
हवा की मौजों पर सवारी करते,
एक-दूजे का हाथ थामे, आसमा को अलविदा कहते हैं
नरम सी धुप में अरमानो के पंख फैलाए,
एक नए सफ़र की शुरुआत करते हैं.

कभी-कबार, अकेला कोई भी दिख जाता है,
अपनी ही मस्ती में, बसंती रंग ओढ़े
धीमे से ज़मी को चुमते हैं.

नीम के पत्तों को कभी गिरते देखा है...
बेखबर होते हैं इस बात से
की ज़मीन तपती होगी
और छूता गरोंदा बहूत दूर

कच्ची सी एक डोर से बंधे हैं तुम और हम
तंग हो जाती है जो,
करवट लेते हो तुम जब.
उलझी-उलझी सी भी लगती है कभी
कुछ सर्द सांसो की तरह,
टकरा के तुमसे जो मुझे चूर करती हैं.

सकरी सी इक मुंडेर पे चलते हैं तुम और हम
बचते- बचाते मीलों तक चलना
पीपल कोई दिखे तो पल भर टेका लेना,
कभी पॉंव फिसले तो गीली मिट्टी के निशान
पीछा करते घर तक पहुँच जाते हैं

सूखे कुछ निशान, उस शाम की याद
अक्सर गीली कर जाते हैं

कई बारिशें बीती, कई बार मैंने चौखट को धोया

कम्बक्त! ऐसी छाप छोड़ी है की आज भी
चौखट के बहार, उस सूखे निशान
पे जब भी पैर रखा है,
पीपल की ठंडी हवा ने मेरी जुल्फों को छुआ है...

अजनबी...

अजनबी सा शेहेर है ये
अजनबी से हैं रासते,
खुद से अजनबी एक मै घूमता हूँ, इस अजनबी सी भीड़ में

अजनबी सी शक्ल है ये,
अजनबी सा है आइना,
अक्स जिसमे अजनबी है, साया भी गुमनाम है.

चलते-चलते राह में,
कभी अजनबी कोई देता है दुआ.
हाथ बढ़ाकर, गले लगा कर, दो-चार कोस कभी मेरे साथ चला

अलविदा कहने की बरी आइ,
अजनबी एक मोड़ पर,
अजनबी हमराही था मेरा, सफ़र भी वो अंजन था.

यूँही ही चलते जा पहुँचा,
भूले-बिसरे एक चौक पर,
हरा सा एक गुलमोहर खड़ा था, कोसी सी नरम धुप में

एक पता बस मालूम था,
किसी अजनबी के नाम का.
ख़त तो था मेरा हाथ में, चौखट पर बेनाम थी.

Tuesday, January 12, 2010

मैंने कल को देखा है...
कभी मेज़ पे धुल में खांसते,
तो कभी दिवार पे अपने पड़ोसी से गप करता.
कभी भरे बाज़ार में भी आ मिलता है,
मेरे पुराने बटुए के एक कोने से...कंही किसी पुराने नोट में लिपटे.

धुंधला भी पड़ते मैंने उसे देखा है,
जब अलमारी के आखरी खंजे में कपड़ो के नीचे से
किसी भूले-बिसरे लिफ़ाफ़े से कल फिसलता है.

मैंने कल को गेखा है...
बेरंग सा भी जन पड़ता है कभी,
कुछ रंगीन नज़रों और हसीं लम्हों को समेटे.

आज कल तो सुना है, दफ्तरों की मेजों तक पहुँच गया है.
कहीं थम-पिन से लटके...
तो कभी कम्प्यूटर से झांकते.

अजीब तो है ये कल की दुनिया...
ये तस्वीरों की दुनिया...
कुछ थमे लम्हें जंहाँ तुम्हे सदियों की सैर पर ले जाते हैं.

Sunday, January 10, 2010

कुछ लिखने की चाह हुई...
तोह झट से कलम उठाई, और यादों का टोकरा भी,
नरम सी धुप भी आ कर बैठी थी मेरे पास.
महफ़िल पूरी थी, अदरक वाली चाय के प्याले के साथ.
दाग उसका मेरे कोरे पन्ने पर आज भी ताज़ा है.
वक्त के थमे पहिये से जान पड़ता है...
सब था, कॉपी-पेन, बीता और आने वाला कल,
पर कुछ यूँहीं
उँगलियों ने मेरा साथ छोड़ दिया.
क्या करूँ, अजीब तो है,
पर तुमसे ख्वाबों में मिलना भी मेरे लिए आसां नहीं है.

Wednesday, December 16, 2009

कभी लफ्ज़ कम पड़ जाते हैं
तो कभी नज़रों की कही पढनी मुश्किल I
माथे की शिकंज, कासके बंद करी मुट्ठी
तो कभी शोर मचाती चुप्पी
नाख़ून को दांत से कुरेदते भी मैं तुम्हे देखा था...
ख़फ़ा रहने के अंदाज़ बड़े हैं और दिखाने को तेवर कई...
जवाब में एक गुस्से का साथ था,
तो कमज़र्फ गुस्सा भी आंसू बनके हवा हो जाता है

Wednesday, November 4, 2009

कल ही की बात है, है ना...
खुदसे खवा,
अपने आप से लड़ते,
उस अकेली राह पर, तनहा यूँही चल पड़े थे...
एक नज़र पलट कर देखा तोह होता...
मेरा बढाया हाथ थमा तो होती,

हर बढ़ते कदम से ज़मी को नापना इतना मुश्किल न लगता...