Tuesday, January 10, 2012

ख़ुश्बू

मेरा घर तेरी ख़ुश्बू पे ज़िन्दा है...
सांस लेता है...तभी तो जीता है...

तुम्हारी साँसों की ख़ुशबू
तुम्हारी आहों की ख़ुशबू
कभी ज़िद ... कभी तपिश की ख़ुश्बू

तुम्हारे ख़्वाबों की ख़ुश्बू
तुम्हारी राहों की ख़ुश्बू,
कभी कोशिश ... कभी जुस्से की ख़ुश्बू

तुम्हारी मोहोब्त की ख़ुश्बू,
तुम्हारी मस्ती की ख़ुश्बू,
कभी ख़ाहिश ... कभी तकलीफ की ख़ुश्बू

रात रानी की बेल चढ़ते चढ़ते
खिड़की तक मेरे पोंहोंच गई है
तुमसी ही तो लगती है हर रात...हर फूल की ख़ुश्बू

तुम्हारे इतर की होती है वो ख़ुश्बू
तुम्हारा पीछा करती वो भीनी सी ख़ुश्बू
मेरे कमरे को भरती...तुम्हारी वो ख़ुश्बू.

मैं तेरी ख़ुश्बू पे ज़िन्दा हूँ...
सांस लेती हूँ ...तभी तो जीती हूँ

Thursday, December 15, 2011

...लगता है!

हवा भी कुछ मद्धम सी लगती है...
धुप कुछ और सुन्हेरी लगती है...
घंटो तक बैठे खिड़की से,
टक-टकी लगाना, एक अजीब सी मशरूफी लगती है...
ग़ुम लगती हुं कुछ ख़यालों में पर,
अक्सर ख़याल भी कुछ ग़ुम से लगते हैं...
चौंक के होंश में आती हूँ तो,
चाय कि प्याली ठंडी...और होंटों पे मुस्कान कोसी सी लगती है...
आँखें चरों ओर झट से घुमती हैं,
चोरी फिर एक बार किसी ने पकड़ी नहीं, लगता है...


दोश किसको दूँ, इन धुंधली सुबहों को या सर्द सी शामों को?
हाय! क्या करें कम्बक्त पूरा दिन ही रूमानी लगता है!

Monday, November 7, 2011

रौनक तो तब भी थी जब साथ बैठे चाय की प्याली से चुस्कियां लिया करते थे...
धुआं, धुंध सा जान पड़ता था...और हकीकत ख्वाब सी लगती थी


Wednesday, August 31, 2011

ख़ुद को भूलूं तो कुछ याद रहे...

ख़ुद को भूलूं तो कुछ याद रहे...
ये कम्बक्त ज़िन्दगी इतनी भी परेशां न रहे

मै से मौला कि ये दुरी भी इसी वजह से है...
माशूक के लिए मोहोबत भी तो ज़रा फीकी सी है...
मै कि पहचान कभी नई...कभी पुरानी रहे...

ख़ुद को भूलूं तो कुछ याद रहे...
ये कम्बक्त ज़िन्दगी इतनी भी परेशां न रहे

Tuesday, August 9, 2011

उस सेहर में...

तकिया मेरा गिला सा था...
उस सेहर में...
जब ख़्वाब मेरा एक टूटा सा था
टुकड़ों को धीरे-धीरे उठाया तो था...
झट से आँगन में दोड़ कर...
खली हाथों से कांच बटोर तो था
सिरहाने रखा था मेरा मलमल का दुप्पटा...
किनार कि सिलाई थोड़ी उधडी...
रंग कुछ फीका सा, कुछ उड़ा सा था
शायद अलविदा कह रही थी मै किसी खास को,
हाथ कस के थमा रखा था मैंने...
लेकिन चेहरा धुंधला ही कुछ दीखता सा था
तकिया मेरा गिला सा था...
उस सेहर में...
जब ख़्वाब मेरा एक टूटा सा था



Monday, August 8, 2011

माशूक

माशूक बना है मेरा नया-नया एक,
घंटों तक आगोश में उसके बैठे....
रंग दुनिया का कुछ अलग ही दीखता है
हर चीज़ धीमी...हर लम्हा रुका सा लगता है
इतराना भी सीख लिया मैंने...आँखे मटकाना, कभी ज़ुल्फ़ झटकना
अदाएं ये भी आती हैं, भूल गई थी मै...

माशूक नया है तो क्या हुआ...
सिलसिला-ए-इश्क तो पुराना है
दास्ताँ दिलों कि ये कंहाँ बदलती है...
मै मै ही रहती हुं...तुम तुम ही रहते हो!

Friday, June 17, 2011

लुक्का-छुप्पी

लुक्का-छुप्पी का इक खेल सा होता जाता है
कभी उजला सफैद...
तो कभी मट-मैला सा आसमा होता जाता hai...
इन कंबख्त बादलों का दीवानेपन...
मेरी सहर को शाम करता जाता है.

बरस जाओ अब तो ऐ हबीब...मेरी रूह तक भीगना चाहती हूँ मै.