Wednesday, October 22, 2014
Saturday, April 6, 2013
चल फ़लक़ के उस पार चलें
चल फ़लक़ के उस पार चलें
सिंदूरी सी शाम जब धीमे-धीमे सुरमई होती होगी
शीशम दिन-भर का थक कर जब
अपना बिखेरा समेटता होगा
वँही मिलूँगा तुमसे मैं, उस सिंदूरी सी शाम में, उस सुरमई सी रात में।
निकल पड़ेंगे बस, दुद्धिया तारों पर पाओं रखते हुए
घूमते, ढूंढते,
किसी घर लौटते परिंदे से राह पूछते
जा पहुँचेंगे फ़लक़ के उस पार
कुछ रौशनी के तारों की चटाई तुम एक बुन लेना
उधार ले आऊंगा बदली कुछ, मस्नत और तकिये करने
वंही बैठेंगे तुम और मैं,
चंदा पे पीठ टिकाए, तारों पर पैर फैलाए।
उँगलियाँ होंगी उँगलियों में उल्छी
उल्छेंगी नज़रें नज़रों से
धड़कन भी तो उल्छी होगी, उफनती कभी, कभी मद्धम होगी
और फिर वो लम्हा आएगा, जब निंदिया का साया छाएगा,
नर्म हवा में कोसा कम्बल कभी तुम काँधे से खींचना,
कभी मैं करवट लेते खींचूंगा
इसी खिंचा-तानी में,
रूठने मानाने में,
रात कटेगी आँखों-आँखों में,
जब बैठेंगे तुम और मैं,
फ़लक़ के उस पार,
चंदा पे पीठ टिकाए, तारों पर पैर फैलाए।
सुरमई सी रात जब, धीमे-धीमे सिंदूरी होती जाएगी।
Thursday, November 29, 2012
रिश्ता
क्यूँ जताते हो हरक़तों से, सवालों से
की गुम हो इतने ख़्वाबों, उम्मीदों में
की फ़लक को मंजिल समझते-समझते
ज़मी से रिश्ता ही तोड़ बैठे।
Thursday, October 18, 2012
ऐयाशी
आज थोड़ी सी ऐयाशी की मोहलत मांगी है,
पांव में घुंघरू, नज़र में प्यास लौटी है,
होंटों पे इक गाली है,
नज़र भी बेशर्म सी, गिरती नहीं, सब तकती रहती है,
आज थोड़ी सी ऐयाशी की मोहलत मांगी है,
अँधेरे से दोस्ती कुछ और गहरी होती जाती है,
यारों में उठने-बैठने की वजह ही बेवजह सी होती जाती है,
रौशनी में आँखे मलने का वक्त भी बड़ा बेवक्त है
आज थोड़ी सी ऐयाशी की मोहलत मांगी है,
लिहाफ़ तो छुटा कांहीं,
जुटी भी कंही छुटी है,
दुपट्टा एक बाकि है, थोड़ा ढलका, थोडा संभला है,
आज थोड़ी सी ऐयाशी की मोहलत मांगी है,
प्यालों से प्याले टकराने की ये ज़िद बड़ी कमज़र्फ है,
लड़खड़ाते कदम भी बात कोई सुनते नहीं, कम्बक्त हैं,
बेसुरिलों की गजलें, नज़्में हाय! सब गुन्गुनानी हैं,
आज थोड़ी सी ऐयाशी की मोहलत मांगी है,
की सवेरा होते होते कांहीं गुम जाए,
की याद पिछली बात कोई भी न आए,
आज में, अब में, बस यंहीं कंही में सब रुक जाए
आज थोड़ी सी ऐयाशी की मोहलत मांगी है।

Thursday, June 7, 2012
कभी यूँ भी हो...
कभी यूँ भी हो...
की फ़लक से उतर आओ तुम
मेरी शाम को सेहर करने
मेरे दिन को तुम्हारी रात करने
कभी यूँ भी हो...
की हक़ीक़त से परे एक जहाँ हो
तीन मज़िले मकान की
छत मोहोब्बत, फर्श आसमान हो
कभी यूँ भी हो...
की आँगन की देहलीज़ पर बैठे
इंतज़ार में तुम्हारे जब आँख लगे
तो चढ़ते चाँद के साथ अफ़ाक पर तुम दिखो
कभी यूँ भी हो...
की अल्फ़ाज़ों की भीड़ में
जब एक छोटा सा लम्हा तन्हा मिले,
तो हाथ थमे मेरा, तुम्हार
बोले ख़ामोशी...मुस्काए सन्नाटा
कभी यूँ भी हो...
की तुम को ढुंढाती
मै ख़ुद से मिल जाऊँ कँही
किसी रोशन सी रात में...किसी केसरी सी सुबह में
कभी यूँ भी हो...
बस यूँ ही कभी...
की पहली बारिश में भीगे हम,
बूंदों सी गीली ख्वाहिशें हों और तापनी जलती हो अरमानो की.
कभी यूँ भी हो...
बस यूँ ही कभी...
कभी यूँ भी हो...
की फ़लक से उतर आओ तुम
मेरी शाम को सेहर करने
मेरे दिन को तुम्हारी रात करने
कभी यूँ भी हो...
की हक़ीक़त से परे एक जहाँ हो
तीन मज़िले मकान की
छत मोहोब्बत, फर्श आसमान हो
कभी यूँ भी हो...
की आँगन की देहलीज़ पर बैठे
इंतज़ार में तुम्हारे जब आँख लगे
तो चढ़ते चाँद के साथ अफ़ाक पर तुम दिखो
कभी यूँ भी हो...
की अल्फ़ाज़ों की भीड़ में
जब एक छोटा सा लम्हा तन्हा मिले,
तो हाथ थमे मेरा, तुम्हार
बोले ख़ामोशी...मुस्काए सन्नाटा
कभी यूँ भी हो...
की तुम को ढुंढाती
मै ख़ुद से मिल जाऊँ कँही
किसी रोशन सी रात में...किसी केसरी सी सुबह में
कभी यूँ भी हो...
बस यूँ ही कभी...
की पहली बारिश में भीगे हम,
बूंदों सी गीली ख्वाहिशें हों और तापनी जलती हो अरमानो की.
कभी यूँ भी हो...
बस यूँ ही कभी...
कभी यूँ भी हो...
Wednesday, April 25, 2012
महफूज़
महफूज़ रखा है तुम्हे मैंने...
कुछ ख्यालों में,
कुछ किताबों में,
चंद लम्हों में,
तमाम रातों में...
महफूज़ रखा है तुम्हे मैंने...
उड़ते आँचल कि किनारों में,
गुलमोहर कि केसरी छाओं में,
चंद आंसुओं में,
तमाम बारिशों में...
महफूज़ रखा है तुम्हे मैंने...
कुछ पुराणी चिट्ठियों में,
कुछ बंद लिफ़ाफ़ों में,
चंद तस्वीरों में,
तमाम यादों में...
महफूज़ रखा है तुम्हे मैंने...
हर सलाम, हर इबादत में,
कभी दुआओं, कभी ख्वाबों में,
दिल के वीरानों में,
महफिलों, बाज़ारों में,
महफूज़ रखा है तुम्हे मैंने...
महफूज़ रखा है तुम्हे मैंने...
कुछ ख्यालों में,
कुछ किताबों में,
चंद लम्हों में,
तमाम रातों में...
महफूज़ रखा है तुम्हे मैंने...
उड़ते आँचल कि किनारों में,
गुलमोहर कि केसरी छाओं में,
चंद आंसुओं में,
तमाम बारिशों में...
महफूज़ रखा है तुम्हे मैंने...
कुछ पुराणी चिट्ठियों में,
कुछ बंद लिफ़ाफ़ों में,
चंद तस्वीरों में,
तमाम यादों में...
महफूज़ रखा है तुम्हे मैंने...
हर सलाम, हर इबादत में,
कभी दुआओं, कभी ख्वाबों में,
दिल के वीरानों में,
महफिलों, बाज़ारों में,
महफूज़ रखा है तुम्हे मैंने...
महफूज़ रखा है तुम्हे मैंने...
Tuesday, March 20, 2012
सिलवटें...
ले दे के कुछ बाकि बचा है तो बस ... सिलवटें
गुज़रे कल की सिलवटें
बीती रात की सिलवटें
एक उम्र भर लम्बी...
एक दुसरे में उलझी हुई, लिपटी हुई सिलवटें
मेरे माथे पे बिखरी झुल्फों सी ये सिलवटें
कंधों पे ढोए बोझ की सबब वो सिलवटें
हाथों पे कभी दौड़ती, कभी रेंगती ये सिलवटें
मुक्कदर को मेरे अपने साथ भागाती, कभी खींचती हुई सिलवटें
कुछ यादों की सिलवटें
कुछ मुलाकातों की सिलवटें
कुछ खोए पलों की...कुछ रौंदे अरमानों की सिलवटें
कभी मनचले से मन पर भी मिली हैं, कुछ खामोश पड़ी सिलवटें
क़बिलित की कुछ, कुछ हार की थी उसमे सिलवटें
कुछ तकरार की और कुछ बेशुमार प्यार की सिलवटें
हाथ से झाड कर, खिंच कर कोशिश भी की थी...
नहीं जाती मेरे नाम के पन्ने में दबी हुई ये सिलवटें
चुप- चाप से आज कल
मेरी पुरानी अलमारी के कांच तक पहुँच गईं हैं ये सिलवटें
ताकती हैं ये मुझको...घूरती नहीं...
गुज़ारे ज़मानों की याद... ये सायानी सी सिलवटें...
ले दे के कुछ बाकि बचा है तो बस ...
मेरे चेहरे कि सिलवटें
मेरे तजुर्बे की सिलवटें.

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